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वीडियो प्रॉडक्शन: प्रोफ़ेशनल्स की तरह कॉन्टेंट बनाने की गाइड।
पहले ड्राफ़्ट से लेकर आखिरी कट तक, वीडियो या फ़िल्म बनाने की बुनियादी बातें सीखें। साथ ही, वीडियो प्रॉडक्शन की प्रॉसेस से जुड़े हर स्टेप को बेहतरीन तरीके से करने में एक्सपर्ट से सुझाव पाएँ।
मुफ़्त ट्रायल शुरू करें | वीडियो प्रॉडक्शन का मुफ़्त ट्रायल शुरू करें {{premiere}} के बारे में जानें
वीडियो प्रॉडक्शन में क्या होता है?
वीडियो प्रॉडक्शन में शुरुआत से आखिर तक कॉन्टेंट बनाना शामिल होता है। इसमें आइडिया तैयार करने से लेकर स्क्रिप्ट लिखने, स्टोरीबोर्ड बनाने, कैमरा सेट अप करने व चलाने, सीन डायरेक्ट करने, समस्याएँ हल करने, फ़ुटेज एडिट करने, और ग्राफ़िक्स जोडने तक के काम शामिल होते हैं। इन चरणों का इस्तेमाल करके, वीडियो प्रॉडक्शन आपके आइडियाज़ को सुंदर और दिलचस्प दिखने वाली कहानियों में बदल देता है।
एक स्टेज तैयार करें: प्री-प्रॉडक्शन क्यों मायने रखता है।
प्री-प्रॉडक्शन, वीडियो प्रॉडक्शन का शुरुआती और सबसे अहम चरण होता है, जिसमें प्लान तैयार किया जाता है। यह चरण, फ़ुल-लेंग्थ फ़िल्मों के लिए तीन महीने से लेकर एक साल तक चल सकता है। इसमें गोल सेट करना, कॉन्सेप्ट तैयार करना, स्टोरीबोर्ड बनाना, शेड्यूल तैयार करना, बजट तय करना, फ़ाइनेंसिंग, और टीम इकट्ठा करने जैसे ज़रूरी काम शामिल होते हैं। प्री-प्रॉडक्शन का असरदार होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह पहले से समस्याएँ पहचानने में मदद करता है और प्रॉजेक्ट को बजट में रखते हुए बिना किसी दिक्कत के आगे बढ़ाने में मदद करता है। हालाँकि, प्रॉजेक्ट के हिसाब से काम और उनकी जटिलता बदल सकती है, जैसे, लोकल मार्केटिंग वीडियो और हाई-बजट म्यूज़िक वीडियो। हालाँकि, प्लानिंग को सबसे अहम काम के तौर पर लेना ज़रूरी होता है, क्योंकि यहीं से तय हो जाता है कि पूरा प्रॉजेक्ट कैसा जाएगा।
प्लानिंग प्रॉसेस के अंदर की बात जानें।
प्रोड्यूसर और डायरेक्टर किसी प्रॉजेक्ट की शुरुआत करते हैं, जिसमें क्रिएटिव कामों को डायरेक्टर सँभालता है। वहीं, पैसे जुटाने और लोगों को हायर करने जैसे कामों की ज़िम्मेदारी प्रोड्यूसर की होती है। क्लाइंट या ऑर्गनाइज़ेशन वीडियो सर्विसेज़ का काम करने के लिए एक प्रॉडक्शन कंपनी को भी हायर कर सकते हैं।
राइटर्स, सिनेमैटोग्राफ़र्स और डायरेक्टर एक साथ मिलकर स्टोरीबोर्डिंग और स्क्रिप्ट में ज़रूरी बदलावों पर काम करते हैं। वहीं, लोकेशन खोजने, बजट फ़ाइनल करने, और तारीखें तय करने का काम प्रॉडक्शन टीम करती है।
वीडियोग्राफ़र हिरोशी हारा कहते हैं कि “आमतौर पर, अगर डायरेक्टर और सिनेमैटोग्राफ़र दोनों साथ हों, तो बेहतर होता है। इससे, वे लोकेशन देखकर एक साथ तय कर सकेंगे कि कौन-सी जगह काम करेगी और कौन-सी नहीं।” प्री-प्रॉडक्शन का एक अहम काम शॉट लिस्ट बनाना भी होता है, जो शूटिंग शेड्यूल को गाइड करती है।
वीडियो की रिलीज़ का प्लान भी शुरुआत में ही बना लेना अच्छा होता है, यानी प्रॉडक्शन के साथ-साथ मार्केटिंग स्ट्रैटेजी भी पहले से तय कर लेनी चाहिए।
शूटिंग से पहले पक्का कर लें कि टीम के सभी लोग प्लान से सहमत हैं। हारा कहते हैं, “शेड्यूल में बदलाव हो सकता है, लेकिन मकसद यह होना चाहिए कि प्री-प्रॉडक्शन के दौरान ही समस्याओं का समाधान हो जाए, ताकि प्रॉडक्शन के समय पूरा फ़ोकस परफ़ॉर्मेंस और सबसे बेहतर शॉट्स कैप्चर करने पर हो।”
प्रॉडक्शन (फ़िल्मिंग)।
प्री-प्रॉडक्शन पूरा होने के बाद बारी आती है प्रिंसिपल फ़ोटोग्राफ़ी की, यानी वह चरण जब असली लोकेशन पर जाकर शूटिंग की जाती है। इसमें फ़िल्मिंग करना, टीम का एक साथ काम करना, साज़-सामान सँभालना, और सेट पर लॉजिस्टिक्स अरेंज करना शामिल होता है। प्रिंसिपल फ़ोटोग्राफ़ी में मुख्य फ़ुटेज शूट किए जाते हैं। इसके अलावा, एक और छोटी-सी टीम आमतौर पर B-रोल, वॉइस-ओवर्स, और साउंड इफ़ेक्ट्स रेकॉर्ड करती है। फ़ुल-लेंग्थ फ़िल्म की शूटिंग आमतौर पर एक से तीन महीने तक चलती है, जबकि किसी छोटे प्रमोशनल या एक्सप्लेनर वीडियो की शूटिंग एक-दो दिनों में ही पूरी हो सकती है।
फ़िल्म बनाने में, कई तरह के कामों के लिए अलग-अलग लोगों की ज़रूरत होती है। इसलिए ऐसी टीम बनाएँ, जो हर ज़रूरी को काम सँभाल सके। आम तौर पर, छोटी टीम में एक कैमरा ऑपरेटर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, साउंड मिक्सर, और लाइटिंग के लिए गैफ़र शामिल होते हैं।
सामान्य लोगों के साथ या कॉरपोरेट वीडियो पर काम करने के सुझाव।
ऐक्टर्स सेट पर अपना तजुर्बा लेकर आते हैं और काम को आसान बनाते हैं, लेकिन वीडियो मार्केटिंग और कॉरपोरेट वीडियोज़ में अक्सर ऐसे लोगों के साथ भी काम करना पड़ता है जिन्होंने पहले कभी ऐक्टिंग नहीं की हो।
वीडियोग्राफ़र मार्गरेट कुर्नियावन कहती हैं, “नॉन-ऐक्टर्स या बिज़नेसेज़ के साथ काम करते समय ज़रूरी होता है कि उनकी सुविधा और समय को ध्यान में रखते हुए शूटिंग को शेड्यूल किया जाए, ताकि वे कोई दबाव महसूस किए बिना असरदार ढंग से काम कर सकें।” इसके अलावा उनका कहना है, “पहले लाइटिंग, साउंड, और कैमरा सेटअप स्टैंड-इन्स के साथ सेटअप कर लें। इसके बाद उन्हें बुलाएँ, ताकि आते ही शूट को शुरू किया जा सके।”
पोस्ट-प्रॉडक्शन।
शूटिंग ख़त्म होने के बाद फ़ुटेज को एडिटिंग के लिए भेजा जाता है। एडिटर्स उस फु़टेज को ऑर्गनाइज़ करते हैं, जोड़ते हैं, सीक्वेंस बनाते हैं, और उसे सुधारकर एक बेहतर क्वालिटी वाला वीडियो तैयार करते हैं। कलरिस्ट्स, कलर करेक्शन और ग्रेडिंग करते हैं, जबकि साउंड इंजीनियर ऑडियो मिक्स करते हैं।
प्रॉजेक्ट कितना बड़ा या छोटा है,एडि उसके आधार एडिटिंग में कई महीने लग सकते हैं। एडिटर्स को एक तय समय के अंदर काम पूरा करना होता है, लेकिन उनके पास इतना समय होता है कि वे Adobe {{premiere}} जैसे इंडस्ट्री के जाने-माने सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करके फ़ाइनल वीडियो को बेहतरीन बना सकें।
- वीडियो एडिटिंग के बारे में जानें: वीडियो एडिटिंग की बुनियादी बातें सीखें, ताकि आप इस काम को समझ सकें और अपनी स्किल्स तैयार कर सकें।
- क्रॉसकटिंग कैसे करें: इस दिलचस्प तकनीक के बारे में और जानें, जो आपको दो कहानियों को एक साथ फ़ॉलो करने की सुविधा देती है।
वीडियो प्रॉडक्शन से जुड़े ज़रूरी सुझाव और सबसे सही तरीके।
- ज़्यादा बारीकी से प्लान बनाएँ: एक ब्रीफ़, स्टोरीबोर्ड, स्क्रिप्ट, और शॉट लिस्ट तैयार करें। साथ ही, शूटिंग से पहले ऐक्टर्स के साथ रिहर्सल भी करें।
- सही लोकेशन चुनें: लोकेशन पहले से देख लें और बैकग्राउंड में दिखने वाली गैर-ज़रूरी जैसी चीज़ों पर भी ध्यान दें। टेस्ट शूट करने से भी काफ़ी मदद मिलती है।
- एक स्टैब्लिशिंग शॉट बनाएँ: स्टैब्लिशिंग शॉट से कैरेक्टर का नज़रिया या कैरेक्टर डेवलपमेंट दिखाने में मदद मिलती है।
- सॉफ़्ट लाइटिंग का इस्तेमाल करें: गहरी परछाइयों से बचने के लिए साफ़्ट लाइटिंग का इस्तेमाल करें। कुदरती धूप या थ्री-प्वाइंट लाइटिंग सेटअप बेहतरीन तरीके से काम करता है।
- बैकग्राउंड में बहुत-सी चीज़ें न रखें: मुख्य कैरेक्टर या सब्जेक्ट से देखने वालों का ध्यान न भटके, इसके लिए बैकग्राउंड में बहुत-सी चीज़ें शामिल न करें।
- साफ़-सुथरा ऑडियो तैयार करने पर ध्यान दें: बैकग्राउंड शोर हटाकर और अच्छी क्वालिटी के रेकॉर्डिंग इक्विपमेंट का इस्तेमाल करके, बेहतर ऑडियो क्वालिटी पक्की करें।
वीडियो प्रॉडक्शन और फ़िल्ममेकिंग के बीच सबसे अहम फ़र्क क्या हैं?
वीडियो प्रॉडक्शन में अलग-अलग फ़ॉर्मैट्स के लिए कॉन्टेंट बनाने पर ध्यान दिया जाता है, जैसे, मार्केटिंग वीडियोज़, कॉरपोरेट वीडियोज़, और ऑनलाइन मीडिया। इसमें आमतौर पर कम समय में काम पूरा किया जाता है, स्क्रिप्ट आसान होती है, और सेटअप भी ज़्यादा आसान और सामान्य होता है।
फ़िल्ममेकिंग में छोटी और बड़ी, दोनों तरह की फ़िल्में बनाई जाती हैं। इसमें बड़ी कहानी, बड़े पैमाने की प्लानिंग, और बड़ी टीम की ज़रूरत होती है। फ़िल्म बनाने में ज़्यादा समय लगता है, ज़्यादा बड़ी स्क्रिप्ट तैयार करनी पड़ती है, और शूटिंग भी बड़े पैमाने पर होती है। आम तौर पर, इसमें ज़्यादा समय लगता है, कहानी लंबी होती है, और प्रॉडक्शन की लागत भी ज़्यादा होती है।
इनको समझकर, आपको अपने प्रॉजेक्ट के गोल और उसके पैमाने के हिसाब से सबसे सही तरीका चुनने में मदद मिलेगी।
क्या आपको कुछ पूछना है? हमारे पास आपके सवालों के जवाब मौजूद हैं।
वीडियो प्रॉडक्शन के चार मुख्य हिस्से ये हैं:
1) डेवलपमेंट
2) प्री-प्रॉडक्शन
3) प्रॉडक्शन
4) पोस्ट-प्रॉडक्शन