आई लेवल शॉट क्या होता है?

आई लेवल शॉट वही है जो इसके नाम से समझ में आ जाता है: इसमें सिनेमैटोग्राफ़र, कैमरे को किरदार की आँखों की सीध में रखता है। इस शॉट में आमतौर पर कैमरे का फ़ोकस, किरदार के घुटनों से लेकर सिर तक होता है और आस-पास की चीज़ें बहुत कम दिखती हैं। किसी सीन को ज़्यादा नाटकीय बनाने या दर्शकों की सोच को अपने काबू में रखने के बजाय, यह शॉट एक सामान्य इंसान के देखने के अंदाज़ को दिखाता है। इसका नतीजा यह होता है कि दर्शक खुद को उस सीन का हिस्सा समझने लगते हैं।

हमारा देखने का जो सामान्य तरीका होता है, आई लेवल ऐंगल्स उससे मेल खाते हैं। इसलिए किसी शॉट की शुरुआती फ़्रेमिंग के लिए ये काफ़ी काम के होते हैं। (फ़्रेम किसी फ़िल्म या वीडियो की एक सिंगल इमेज को बोलते हैं। "शॉट फ़्रेमिंग" में तय किया जाता है कि कैमरे के लेंस से दिख रहे पूरे सीन को कैसे कम्पोज़ किया जाए। इसमें कई चीज़ें शामिल हैं, जैसे कि ऐक्टर्स कहाँ खड़े हैं, वे सीन में कैसे मूव कर रहे हैं, सेट कैसा है, बैकग्राउंड सीनरी कैसी है, यानी हर वह चीज़ जो कैमरा देख रहा है।) शुरुआती फ़्रेमिंग को किसी सीन का पहला सेटअप माना जा सकता है, इससे पहले कि कोई बड़ा ऐक्शन हो या कहानी में मोड़ आए।

कई सीन्स को पूरी तरह से इस तरह शूट करना बेहतर होता है जिसमें देखने के सामान्य तरीके को ध्यान में रखकर शूट किया जाए। सामान्य किस्म वाले ढेरों या TV सीन्स के लिए यही सबसे जाना-माना सेटअप है। यह उन सभी सीन्स के लिए लोगों का पसंदीदा शॉट होता है जिनमें किरदार को एक ही जगह पर खड़े-खड़े या बैठे-बैठे बात करनी होती है, जैसे कि केबल न्यूज़ में कैमरे को देखकर बात करने वाले लोग या ज़्यादातर YouTube वीडियोज़।

असल में, इन शॉट्स का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है। लगभग हर फ़िल्म और टीवी शो इनसे भरा होता है, लेकिन हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं। ज़्यादातर मौकों पर यही इसका मकसद भी होता है, लेकिन आई लेवल शॉट्स सिनेमैटोग्राफ़र के लिए महज़ एक मामूली टूल ही नहीं होते, इनके अपनी भी कुछ खासियतें होती हैं।

न्यूट्रल निगाह।

आई लेवल शॉट सीन को जैसे का तैसा दिखाता है। जहाँ लो-ऐंगल कैमरा शॉट किरदार को ताकतवर दिखाने के लिए नीचे से ऊपर की ओर देखता है और हाई-ऐंगल शॉट किरदार को कमज़ोर दिखाने के लिए ऊपर से नीचे की ओर देखता है, वहीं आई लेवल शॉट दर्शकों को किरदार के बराबर होने का एहसास देता है।

"वन ऑफ़ द गैंग" इफ़ेक्ट की मदद से दर्शक किसी किरदार के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। उदाहरण के लिए, द हंगर गेम्स जैसी फ़िल्म में, डायरेक्टर बड़ी आसानी से लो-ऐंगल शॉट इस्तेमाल करके कैटनिस को एक सुपर हीरो दिखा सकते थे, लेकिन उन्होंने ज़्यादातर आई लेवल शॉट्स इस्तेमाल किए। इस तरह, जब वह कमान सँभालती है, तो दर्शक उसे अपने बराबर महसूस करते हैं और हमें लगता है कि हम भी उसकी बगावती सेना में उसके साथ हैं।

(कभी-कभी डायरेक्टर्स बीच का रास्ता निकालते हैं। इसमें वे आई लेवल शॉट्स के साथ कंधे या कूल्हे से लिए गए ऐंगल्स भी जोड़ देते हैं, ताकि किरदार के रुतबे को बस थोड़ा-सा बढ़ाकर या घटाकर दिखाया जा सके कि यह तय करना मुश्किल है कौन सा किरदार किस पर हावी है। गेम ऑफ़ थ्रोन्स के ज़्यादातर एपिसोड इसके उदाहरण हैं।)

निर्देशक, कहानी पर रचनात्मक कंट्रोल बनाए रखने के लिए कैमरा ऐंगल्स का इस्तेमाल सोच-समझकर करते हैं। वे हाई या लो ऐंगल्स की मदद से कहानी को ऐसे मोड़ दे सकते हैं कि दर्शक खुद को किरदार से ज़्यादा बड़ा या छोटा महसूस करें या उससे जुड़ा हुआ या कटा हुआ महसूस करें।

बेशक, एक न्यूट्रल कैमरा ऐंगल को भी सोच-समझकर ही इस्तेमाल किया जाता है। जब कोई फ़िल्ममेकर 'हकीकत' को न्यूट्रल तरीके से पेश करता है, यानी चीज़ों को ज्यों का त्यों दिखाता है, तो दर्शक कहानी या किरदारों को लेकर कोई राय बनाने के बजाए आराम से यह देखते हैं कि कहानी में आगे क्या होगा।

जब दर्शक किसी सीन को न्यूट्रल ढंग से देखकर खुद तय करते हैं कि क्या हो रहा है, तो डायरेक्टर को सहूलियत मिल जाती है कि वह आगे चलकर कहानी में बेहद बेरहम किरदारों को भी ले आए। (अमेरिकन साइको के शुरुआती सीन इसका सबसे बड़े उदाहरण हैं।)

लेकिन न्यूट्रल होना सिर्फ़ एक क्रिएटिव फ़ैसला ही नहीं होता। कई बार फ़िल्मकार को वाकई में न्यूट्रल होना पड़ता है। ऐसे में, सीधी-सच्ची जानकारी देने के लिए (जैसे, किसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में) या किसी इंटरव्यू के दौरान वीडियो में अपने खुद के खयालात डालने से बचने के लिए (जैसे, कोई डॉक्युमेंट्री फ़िल्माते समय) आई लेवल कैमरा ऐंगल का इस्तेमाल करना ही सबसे सामान्य तरीका होता है।

दर्शकों और कहानी के बीच का फ़ासला मिटाना।

न्यूट्रल होना ही आई लेवल शॉट्स का अकेला फ़ायदा नहीं है। चूँकि यह ऐंगल असली लगता है, इसलिए दर्शकों और कहानी के बीच का फ़ासला कम हो जाता है, जिससे वे खुद को कहानी का हिस्सा महसूस करते हैं।

आई लेवल शॉट हमें किरदार के बराबर खड़ा करता है, जिससे हमें उससे जुड़ाव महसूस होता है और उसके लिए हमदर्दी पैदा होती है। यह ऐसे किरदारों को भी इंसानी रंग देता है जिनसे लोग हमदर्दी नहीं रखते, यहाँ तक कि बेरहम लोगों और खूँखार कातिलों को भी लगता है लोग उनके नज़रिये को समझेंगे। (याद करें अपनी पसंदीदा हॉरर फ़िल्म्स।)

''सामान्य'' किरदार हों, तो यह जुड़ाव और भी मज़बूत हो जाता है। आई लेवल शॉट्स हमें सीधा किरदार की सोच तक ले जाते हैं। हम सचमुच उनकी तरह सोचने लगते हैं। कहानी में किसी ज़रूरी मोड़ के दौरान ये व्यक्तिगत अनुभव देते हैं। जब आप किसी किरदार के इतना करीब हों, तो जज़्बात गहरे होते हैं और तुरंत उमड़ते हैं। इससे ऐक्शन के रोमांच में और भी तेज़ी महसूस होती है।

अमेली जैसी प्यारी रोमांटिक कॉमेडी में तो यह रिश्ता और भी ज़्यादा मज़बूत हो जाता है। इस फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी की काफ़ी तारीफ़ हुई। जैसे-जैसे हम पेरिस की शर्मीली वेट्रेस की प्रेम कहानी में आगे बढ़ते हैं, हम उसके साथ दिल से जुड़ते चले जाते हैं। जब इतने करीबी कैमरा शॉट्स के ज़रिए मुख्य किरदार की आँखों से दुनिया देखी जाती है, तो दर्शक भावनात्मक रूप से इस कदर डूब जाते हैं कि उन्हें लगता है वे खुद मॉन्टमार्ट्रे में अमेली के साथ हैं।

सारा खेल आँखों का ही है।

बिना कुछ आई लेवल शॉट्स के फ़िल्म बनाना मुश्किल है, लेकिन सिनेमैटोग्राफ़र के इस ज़रूरी पर अक्सर भुला दिए जाने वाले हिस्से की अहमियत को समझने की कोशिश करें। अगली बार जब आप कोई फ़िल्म या शो देखें, तो गौर करें कि आई लेवल शॉट्स कितनी बार आते हैं और उनका इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है।

या फ़िल्ममेकर जॉन क्रासिंस्की का उदाहरण लें, जिन्होंने द ऑफ़िस में जिम का रोल नौ सीज़न तक निभाया। यह शो एक बोरिंग ऑफ़िस सेट पर फ़िल्माया गया था, जहाँ किरदार आपस में बात करते रहते थे। इस शो के 200 से ज़्यादा एपिसोड थे। आपको लग सकता है कि वह हर रोज़ कैमरे के सामान्य ऐंगल्स को फ़ेस करते-करते ऊब गए होंगे। (हालाँकि, शो के मॉक्युमेंट्री (मज़ाकिया डॉक्यूमेंट्री) फ़ॉर्मैट की वजह से डंडर मिफ़लिन का सारा ऐक्शन सिर्फ़ एक कैमरे में दिखाना सही साबित हुआ और शो ने सिंगल-कैमरा पिक्चर एडिटिंग के लिए दो एमी अवॉर्ड भी जीते।)

इसके बावजूद, जब क्रासिंस्की को अपने शॉट्स चुनने का मौका मिला, तो उन्होंने ए क्वाएट प्लेस की दोनों फ़िल्मों में आई लेवल शॉट्स को प्रमुखता से दिखाने का फ़ैसला किया।

ज़ाहिर है, सारा खेल आँखों का ही है।

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