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फ़िल्म और वीडियो में बेहतरीन मीडियम क्लोज़-अप शॉट्स कैसे लें।

आपका प्रॉजेक्ट कोई भी क्यों न हो, मीडियम क्लोज़-अप शॉट्स का इस्तेमाल बार-बार करना पड़ सकता है। जानें कि कहानी के हिसाब से, इस शॉट का इस्तेमाल कब और किस तरह किया जाए।

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मीडियम क्लोज़-अप शॉट क्या होता है?

सिनेमैटोग्राफ़ी में एक मीडियम क्लोज़-अप (MCU) का फ़्रेम, किरदार के सिर के ऊपरी हिस्से से शुरू होकर सीने के नीचे तक जाता है। एक न्यूट्रल शॉट होने की वजह से, मीडियम क्लोज़-अप शॉट, बैकग्राउंड को थोड़ा-सा दिखाते हुए भी किरदार के चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज को कैप्चर करता है।

मीडियम क्लोज़-अप बनाम अन्य कैमरा शॉट्स।

किसी भी सीन के लिए फ़िल्ममेकर जिस तरह का कैमरा शॉट चुनता है, उससे दर्शकों के अनुभव पर बड़ा असर पड़ता है। हर शॉट, ऐक्शन को दिखाने के साथ-साथ किरदारों के आपसी रिश्ते या किरदार और माहौल के रिश्ते भी तय करता है। ज़्यादातर सीन में यह ज़रूरी होता है कि आप इतने करीब रहें कि ऐक्शन और भावनाओं को कैप्चर कर सकें, लेकिन इतने पास नहीं कि दर्शक सहज महसूस न कर पाएँ।

बहुत ज़्यादा वाइड होने से बचें

एस्टैब्लिशिंग शॉट की मदद से पहला सीन सेट करने के बाद, वाइड शॉट (जिसे लॉन्ग शॉट या फ़ुल शॉट भी कहा जाता है) का इस्तेमाल किरदारों को उनके आस-पास के माहौल के साथ दिखाने के लिए किया जा सकता है। इस तरह का शॉट दर्शकों को यह समझने में मदद करता है कि कौन सा किरदार कहाँ है और किसकी ज़्यादा चलती है। भले ही फ़ुल शॉट्स किसी को चलते-फिरते दिखाने के लिए बेहतरीन हों, लेकिन अगर पूरी कहानी को इतनी दूर से फ़िल्माया जाएगा, तो दर्शक को लग सकता है कि वे कोई सीसीटीवी फ़ुटेज देख रहे हैं।

किरदार के करीब जाते हुए, मीडियम शॉट में किरदार को कमर से ऊपर तक फ़्रेम किया जाता है। डायरेक्टर और फ़ोटोग्राफ़र अलीशिया जे. रोज़ कहती हैं, "यह शॉट माहौल और किरदार के बीच बैलेंस बनाता है।" इसमें दर्शकों को बैकग्राउंड का अंदाज़ा भी रहता है, साथ ही किरदार के हाव-भाव भी दिख जाते हैं। यह शॉट, कॉमेडी या ऐसे सीन के लिए बेहतर है जहाँ किरदार और जगह, दोनों दिखाने हों। लेकिन बातचीत के लिए यह शॉट थोड़ा दूर हो जाता है।

बहुत ज़्यादा नैरो शॉट भी न लें

शॉट-साइज़ स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर होते हैं क्लोज़-अप्स और एक्सट्रीम क्लोज़-अप्स। ये फ़्रेम को सब्जेक्ट के चेहरे से भर देते हैं। इनमें चेहरे की एक-एक खूबी करीब से देखी जा सकती है और ये शॉट्स इंटेन्स होते हैं। फ़िल्मकार इनका इस्तेमाल कभी-कभी ही करते हैं। रोज़ कहती हैं, "क्लोज़-अप पूरी तरह से सब्जेक्ट के बारे में होता है, पूरा फ़ोकस उसी पर होता है, उसकी आँखों में झाँका सकता हैं, उसके मन की बात सुनी जाती है।" बेचैनी या खुशी के लम्हों में किरदार के चेहरे पर ज़ूम इन किया जा सकता है या स्टेडीकैम की मदद से ग्लाइड इन किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रखें कि चेहरे वाला क्लोज़-अप स्क्रीन पर बहुत देर तक न दिखाएँ, नहीं तो दर्शकों के ऊब जाने का जोखिम होता है।

अपने शॉट को बिलकुल सही-सही फ़्रेम करें

मीडियम क्लोज़-अप शॉट को सबसे सही दूरी वाला शॉट माना जाता है, क्योंकि यह दर्शकों को किरदार के चेहरे से न ज़्यादा दूर रखता है, न ज़्यादा पास। यह शॉट उन सीन्स के लिए सबसे बढ़िया होता है जहाँ लोग बातचीत कर रहे हों या जहाँ ज़्यादा हलचल न हो। वीडियोग्राफ़र और एडिटर लीसा बोल्डन के मुताबिक, "मीडियम क्लोज़-अप सेमी-इंटिमेट होता है।" वे कहती हैं, "यह शॉट किसी व्यक्ति से सहज रूप से बात करने का अहसास देता है और आपको बातचीत के हिसाब से सही दूरी पर रखता है।"

मीडियम क्लोज़-अप शॉट में दर्शक को आस-पास की जगह दिखती तो है, पर बैकग्राउंड थोड़ा धुँधला दिखता है। अगर यह सीन के मूड के हिसाब से है, तो शैलो डेप्थ ऑफ़ फ़ील्ड तकनीक का इस्तेमाल करके बैकग्राउंड को सपनों जैसा धुँधला किया जा सकता है, जिसे बोके इफ़ेक्ट कहते हैं।

मीडियम क्लोज़-अप का इस्तेमाल कब करें।

न्यूट्रल शॉट होने की वजह से, आई-लेवल कैमरा ऐंगल पर मीडियम क्लोज़-अप का इस्तेमाल लगभग हर सीन में किया जा सकता है। बोल्डेन कहती हैं, "यह आपका मुख्य शॉट है, खास तौर से डायलॉग के दौरान। मैं इसका इस्तेमाल तब करती हूँ, जब मैं चाहती हूँ कि दर्शक आराम से कहानी देखें और कहानी बिना रुके आगे बढ़े।"

टू शॉट

जहाँ दो किरदारों को एक साथ दिखाना हो (टू शॉट), खासकर जब वे आपस में बात कर रहे हों या बहस कर रहे हों या एक-दूसरे को किस कर रहे हों, तो मीडियम क्लोज़-अप बहुत असरदार होता है। असल में, ज़्यादातर पुरानी मशहूर फ़िल्मों के किसिंग सीन मीडियम क्लोज़-अप शॉट में होते हैं।

ओवर द शोल्डर

ओवर द शोल्डर शॉट्स (कंधे के ऊपर से लिए गए शॉट्स) भी अक्सर मीडियम क्लोज़-अप होते हैं। चाहे आप पूरे सीन को एक किरदार के कंधे के ऊपर से दिखाते रहें या शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल करके एक से दूसरे किरदार पर जाएँ। यह शॉट दर्शकों को बातचीत में सीधा शामिल कर लेता है। कैमरे का ऐंगल ऊँचा या नीचा करने पर, मीडियम क्लोज़-अप शॉट दिखा सकता है कि कौन-सा किरदार ज़्यादा ताकतवर है या कौन-सा कमज़ोर है।

बेहतरीन मीडियम क्लोज़-अप शॉट के लिए 5 टिप्स।

अपने शॉट को सेट करते समय इन ज़रूरी एलिमेंट्स को आज़माएँ।

"एक क्लोज़-अप शॉट में, आपका पूरा ध्यान बस उसी व्यक्ति पर होता है, आप उसी पर फ़ोकस करते हैं, उसकी आँखों को देखते हैं, और उसकी भावनाओं को समझते हैं।"

पोस्ट-प्रॉडक्शन में मीडियम क्लोज़-अप शॉट्स बनाएँ।

पोस्ट-प्रॉडक्शन के दौरान, हो सकता है आपको पता चले कि आपका एक मीडियम क्लोज़-अप ठीक नहीं है या आपको किसी और साइज़ का शॉट इस्तेमाल करना है। ऐसे मामलों में, Adobe Premiere जैसे वीडियो एडिटिंग सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करके किसी किरदार पर ज़ूम इन किया जा सकता है।

अगर वीडियो को 4K या 5K जैसे हाई रेज़लूशन में शूट किया जाता है, तो एडिटिंग के समय ज़ूम करके मीडियम क्लोज़-अप या क्लोज़-अप बनाया जा सकता है। इससे क्वालिटी में कोई कमी नहीं आएगी। बोल्डेन कहती हैं, "यह तकनीक तब अहम है जब आप वन-मैन आर्मी हों या आपके पास सिर्फ़ एक कैमरा हो। एक ही शॉट से अपने सारे क्लोज़-अप और मीडियम क्लोज़-अप निकाले जा सकते हैं। मेरे जैसे अकेले काम करने वाले फ़िल्ममेकर के लिए यह बहुत काम का रहा है।"

चाहे आप अकेले काम करें या टीम के साथ, फ़ीचर फ़िल्मों पर काम करें या विज्ञापनों पर, आपको मीडियम क्लोज़-अप शॉट का इस्तेमाल बार-बार करना होगा। बस ऊपर दिए गए सुझावों को ध्यान में रखें और आपको वह फ़ुटेज मिल जाएगी जिसकी आपको अपनी कहानी सुनाने के लिए ज़रूरत है।


कॉन्ट्रीब्यूटर्स

एलिसिया जे. रोज़, लीसा बोल्डेन


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