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शॉट-रिवर्स शॉट क्या होता है?

शॉट-रिवर्स शॉट ऐसी तकनीक है जिसमें सिनेमैटोग्राफ़ी और फ़िल्म एडिटिंग, दोनों शामिल होते हैं। फ़िल्मकार इसका इस्तेमाल करके किरदारों के मन के भाव और उनका नज़रिया दर्शाते हैं, कभी बिलकुल खुले तौर पर और कभी सिम्बल्स का इस्तेमाल करके।

{{premiere}} के बारे में जानें


कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए शॉट-रिवर्स शॉट एक परखी हुई तकनीक है।

शॉट-रिवर्स शॉट, फ़िल्म बनाने की एक आम तकनीक है, जो हॉलीवुड के शुरुआती दौर से ही इस्तेमाल होती आ रही है। इसका इस्तेमाल करने पर ऐसा लगता है कि कोई बातचीत बिना किसी रुकावट के चल रही है। इसमें कैमरा ऐंगल बदलते हुए कट किया जाता है, जिससे लगता है कि बातचीत बिना रुके चल रही है। इसे कन्टिन्युटी एडिटिंग कहा जाता है, यानी वो फ़िल्मी जादू जो अलग-अलग शॉट्स को जोड़कर कहानी को सटीक और साफ़ तौर पर दिखाता है। स्टैब्लिशिंग शॉट से सीन सेट करने के बाद, कैरेक्टर्स के बीच की बातचीत और उनकी लोकेशन दिखाने के लिए आम तौर पर शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल किया जा सकता है।

शॉट-रिवर्स शॉट की शुरुआत किसी एक कैरेक्टर के शॉट से होती है। फिर कट करके दूसरे कैरेक्टर या सब्जेक्ट को दिखाया जाता है, जिसे वह किरदार देख रहा है यानी यह शॉट पहले शॉट के उलटे ऐंगल से लिया जाता है। इसके बाद, फिर से पहले कैरेक्टर पर कट किया जाता है, ताकि उसका रिएक्शन दिखाया जा सके। इस तरह दोनों शॉट्स के बीच आगे-पीछे कट करते हुए यह सीक्वेंस तब तक चलता है, जब तक सीन चालू होता है।

इंडिपेंडेंट फ़िल्म प्रोड्यूसर निक एस्कोबार कहते हैं, “यह तकनीक लंबे समय से इसलिए इस्तेमाल हो रही है, क्योंकि यह काम करती है। यह आपको कहानी जल्दी और असरदार तरीके से बताने में मदद करती है।”

शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल कैसे करें।

शॉट-रिवर्स शॉट, खास तौर पर डायलॉग वाले सीन में बहुत काम के साबित होते हैं। इसमें फ़िल्ममेकर बातचीत को दो अलग-अलग ऐंगल्स से शूट करते हैं, फिर फ़िल्म एडिटिंग के दौरान इन शॉट्स के बीच कट करते हैं, ताकि ऐसा लगे कि बातचीत रियल टाइम में हो रही है।

एस्कोबार कहते हैं, “कोई एक कैरेक्टर पहले कुछ कहता है, फिर हम दूसरे कैरेक्टर का रिएक्शन देखते हैं। इसके बाद, दूसरा कैरेक्टर जवाब देता है और हम पहले कैरेक्टर का रिएक्शन देखते हैं। इसी तरह सीन चलता रहता है।”

शॉट-रिवर्स शॉट स्ट्रक्चर का इस्तेमाल करते हुए बातचीत शूट करने के अलग-अलग तरीके भी होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ फ़िल्मकार सिंगल शॉट्स का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें एक समय पर फ़्रेम में सिर्फ एक ही किरदार दिखता है। इन्हें अक्सर POV यानी पॉइंट-ऑफ़-व्यू शॉट कहा जाता है, क्योंकि ये दर्शकों को ऐसा एहसास देते हैं कि वे हर किरदार की निगाह से चीज़ें देख रहे हैं।

वहीं, कुछ डायरेक्टर ओवर-द-शोल्डर शॉट्स का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिसमें फ़्रेम में बात करने वाले कैरेक्टर की पीठ और कंधे का थोड़ा हिस्सा दिखता है, जबकि फ़ोकस उस कैरेक्टर पर होता है जिससे वह बात कर रहा है। एस्कोबार कहते हैं, “कभी-कभी इन्हें डर्टी फ़्रेम्स कहा जाता है, क्योंकि फ़्रेम में अलग से चीज़ें जोड़कर स्क्रीन को डर्टी बनाया जाता है। कौन-सा शॉट इस्तेमाल करना है, यह पूरी तरह उस मूड और एहसास पर निर्भर करता है जो कहानी के हिसाब से आपको अपने दर्शकों को दिखाना है।”

https://main--cc--adobecom.aem.page/cc-shared/assets/video/creativecloud/video/production/media_167021ce159e3eacb2d930bd0299c55469b0da87b.mp4#_autoplay | दो क्लिप्स को जोड़कर शॉट-रिवर्स शॉट बनाना

शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल करने के लिए, आपको सीन में दो कैरेक्टर्स की ज़रूरत भी नहीं होती। अगर इसे सीन में मौजूद किसी चीज़ के कटअवे शॉट के साथ जोड़ दिया जाए, तो यह दिखा सकता है कि कोई कैरेक्टर उस चीज़ या अपने माहौल पर कैसा भावनात्मक रिएक्शन दे रहा है।

डायरेक्टर और सिनेमैटोग्राफ़र पैड्रिक ओमेरा कहते हैं, "किसी किरदार को टेबल पर रखे एक लेटर को देखते हुए दिखाया जा सकता है। फिर रिवर्स ऐंगल में उसी कैरेक्टर को ऐसे दिखाया जा सकता है कि फ़्रेम में लिफ़ाफे़ का थोड़ा हिस्सा भी नज़र आए। उसके बाद हम देख सकते हैं कि वह कैरेक्टर उस लेटर को देखकर कैसा महसूस कर रहा है और शायद वो रोना शुरू कर दे। वहीं, अगर फ़्रेम में लेटर न दिखे, तो हमें समझ ही नहीं आएगा कि वह क्यों रो रहा है।”

शॉट-रिवर्स शॉट की प्लानिंग करना।

शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल करके, कोई सीन शूट करने से पहले ज़रूरी है कि कैमरा शॉट्स और ऐक्टर्स की मूवमेंट (ब्लॉकिंग) पहले से प्लान कर ली जाए। ऐसा करके 180-डिग्री रूल तोड़ने से बचा जा सकता है।

एस्कोबार कहते हैं, “सीधे शब्दों में कहें, तो जहाँ कैमरा लगाया जाता हैं, वहाँ से सिर्फ़ 180 डिग्री के अंदर की चीज़ें ही दिखाई जा सकती हैं। इससे दर्शकों को दिशा समझने में मदद मिलती है। अगर मैं दो लोगों की बातचीत में शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल कर रहा हूँ, और एक शॉट में एक व्यक्ति दाईं ओर देख रहा है, तो दूसरे शॉट में दूसरे व्यक्ति को बाईं ओर देखना चाहिए, ताकि उनकी आईलाइन मैच हो और ऐसा लगे कि वे एक-दूसरे से बात कर रहे हैं।”

आपको किस साइज़ का शॉट लेना है और कैमरा ऑपरेटर कितनी डेप्थ ऑफ़ फ़ील्ड का इस्तेमाल कर रहा है, इसके हिसाब से आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि हर किरदार की बैकग्राउंड उसी लोकेशन से मैच करे जैसी कि मास्टर शॉट में दिखाई गई थी।

ओमेरा कहते हैं कि “शॉट-रिवर्स शॉट शूट करते समय, लोकेशन की तीनों डाइमेंशन्स को समझना बहुत ज़रूरी होता है। खासतौर पर उस समय जब मूड सेट करने और सीन्स के विज़ुअल एलिमेंट्स के बीच तालमेल बैठाने के लिए लाइटिंग सेट अप करने की बात आए।” उदाहरण के लिए, अगर एक शॉट में किसी किरदार के कंधे पर दाईं तरफ़ से रोशनी पड़ रही है, तो अगले शॉट में जब हम उसका चेहरा देखें, तब भी रोशनी दाईं तरफ़ से ही आनी चाहिए।

कैरेक्टर को डेवलप करने के लिए शॉट-रिवर्स शॉट का इस्तेमाल करना।

सिर्फ़ दो लोगों की बातचीत दिखाने के अलावा, शॉट-रिवर्स शॉट की इस आसान तकनीक को क्रिएटिव तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे, दर्शकों को कैरेक्टर्स के बीच के रिश्तों के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। अगर आपको दिखाना है कि किसी सीन में कोई किरदार कमज़ोर या बेबस है, तो उसका शॉट हाई ऐंगल से लिया जा सकता है, ताकि वह छोटा और कमज़ोर लगे। इसके उलट, अगर आपको किसी किरदार को ताकतवर और कंट्रोल में दिखाना है, तो उसका शॉट लो ऐंगल से लें, जिससे वह बड़ा, डरावना, और स्क्रीन पर हावी दिखे।

कैमरा मूवमेंट्स भी किरदारों के बदलते रिश्ते दर्शा सकते हैं। उदाहरण के लिए, क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म 'द डार्क नाइट' में जब पुलिस जोकर से पूछताछ कर रही होती है, तो उनकी बातचीत कैमरे को एक जगह पर रखकर फ़िल्माई गई है। लेकिन जैसे ही बैटमैन आता है और वह ज़्यादा ज़ोर देकर पूछताछ शुरू करता है, तो उनके डायलॉग को हैंडहेल्ड कैमरे के साथ शॉट-रिवर्स शॉट से शूट किया जाता है। इससे दर्शकों के लिए बताना मुश्किल हो जाता है कि फ़ोकस कब किसके ऊपर होगा।इससे पता चलता है कि इन दोनों किरदारों के बीच की खींचतान अब उथल-पुथल की तरफ़ बढ़ रही है।

ओमेरा कहते हैं, “कम्युनिकेशन में सिर्फ़ कही गई बातें ही सबकुछ नहीं होतीं। उनमें कुछ अनकही बातें भी होती हैं और उनके पीछे कुछ जज़्बात भी छिपे होते हैं। यह भी मायने रखता है कि किरदार किस तरह अपनी बातें ज़ाहिर कर रहे हैं और किस तरह दूसरों को सुन रहे हैं। इसे सही से करना अहम होता है, क्योंकि शॉट-रिवर्स शॉट इन्हीं चीज़ों के लिए असरदार होता है।”


कन्ट्रीब्यूटर्स

निक एस्कोबार, पैड्रिक ओमेरा


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