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Adobe Premiere

आपके लिए ट्रैकिंग शॉट के बारे में सारी काम की जानकारी।

जानें कि सीन तैयार करने, किरदारों को पेश करने और दर्शकों से एक नए अंदाज़ में जुड़ने के लिए ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।

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ट्रैकिंग शॉट क्या होता है?

अक्सर “ट्रैकिंग शॉट” और “डॉली शॉट” को एक जैसा माना जाता है, लेकिन इन दोनों में हल्का-सा फ़र्क होता है। ट्रैकिंग शॉट वह होता है, जिसमें कैमरा किसी सब्जेक्ट को फ़ॉलो करता है, जबकि डॉली शॉट में कैमरा एक पहिये वाले प्लेटफ़ॉर्म (डॉली) पर लगाया जाता है, जो किसी भी दिशा में चल सकता है। यानी, हर डॉली शॉट एक ट्रैकिंग शॉट होता है, लेकिन हर ट्रैकिंग शॉट में डॉली का इस्तेमाल नहीं होता।

सिनेमा के शुरुआती दिनों में ट्रैकिंग शॉट्स के लिए बड़े और भारी कैमरे इस्तेमाल किए जाते थे, जिन्हें मुश्किल ट्रैक्स पर लगाया जाता था। इससे कैमरे का मूवमेंट सिर्फ़ आसान रास्तों तक सीमित रहता था। आज के डिजिटल कैमरे हल्के और पोर्टेबल हैं, जिससे मूवमेंट में ज़्यादा लचीलापन मिलता है। अब फ़िल्ममेकर जटिल शॉट्स ले सकते हैं, जैसे हैंडहेल्ड ट्रैकिंग, जिसमें कैमरा किसी सब्जेक्ट को तंग जगहों या ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी फ़ॉलो कर लेता है।

अच्छे ट्रैकिंग शॉट की क्या खासियत होती है।

कैमरा शॉट्स कई तरह के होते हैं और उनमें से ट्रैकिंग शॉट कई तरह से काम आने वाली तकनीक होती है। यह फ़िल्ममेकर्स को कहानी दिखाने और दर्शकों से जुड़ने में मदद करती है। सिनेमा हिस्ट्री के कुछ बेहतरीन ट्रैकिंग शॉट्स फ़िल्म की रफ़्तार तय करने, गहरे भाव दर्शाने, और किरदारों को सामने लाने में काम आते हैं।

फ़िल्म 'द शाइनिंग' में स्टैनली कुब्रिक ने एक लंबे ट्रैकिंग शॉट का इस्तेमाल किया है। इससे जब मुख्य चाइल्ड किरदार, डैनी, अपनी प्लास्टिक ट्राइसाइकल पर बैठे हुए भूटिया होटल के घुमावदार गलियारों से होकर गुज़रता होता है, तो सीन में तनातनी और डर का एहसास पैदा होता है। इसके अलावा, डायरेक्टर सैम मेंडेस ने अपनी फ़िल्म '1917' को पूरी तरह से ट्रैकिंग शॉट्स लेकर ही बनाया था। इस तरह उन्होंने पहले वर्ल्ड वॉर का ऐसा नज़ारा पेश किया था जिससे दर्शक उस समय को दिल की गहराइयों तक महसूस करने पर मजबूर हो जाते हैं।

पहले के समय में ट्रैकिंग शॉट्स के लिए कैमरा डॉली नाम की मशीन इस्तेमाल की जाती थी, जो एक ट्रैक यानी पटरियों पर चलती थी। डॉली शॉट्स से कैमरा को आसानी से आगे या पीछे (जिसे डॉली इन और डॉली आउट कहा जाता है) चलाया जा सकता था। सिनेमैटोग्राफ़र पॉलीयस कॉन्टीजेवस के अनुसार, “ट्रैकिंग शॉट्स पहले जितने लोकप्रिय थे, आज उससे भी ज़्यादा हैं, क्योंकि अब इक्विपमेंट्स हल्के और सस्ते हो गए हैं।” आज स्टेडीकैम या गिंबल डिवाइस की मदद से कैमरे को बिना किसी रुकावट के और बिना हिले-डुले चलाना पहले से कहीं आसान हो गया है।

एक यादगार ट्रैकिंग शॉट सिर्फ़ ऐक्शन को ही रेकॉर्ड नहीं करता, बल्कि वह सीन की कहानी या उसमें मौजूद भावों को भी एक नए मुकाम पर ले जाता है। कहानी के लिए यादगार मूवमेंट ज़रूरी होता है। मिसाल के तौर पर, इससे किरदारों के बारे में कुछ अहम जानकारी सामने आ सकती है और उस जानकारी की वजह से दर्शकों का उन किरदारों से जुड़ाव और गहरा हो सकता है।

यहाँ दिया गया है कि फ़िल्म में अच्छे ट्रैकिंग शॉट के लिए उसमें क्या-क्या होना चाहिए:

  • सब्जेक्ट पर साफ़ तौर पर फ़ोकस
  • बिना रुकावट के मोशन
  • कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करने वाले मूवमेंट
  • फ़ोकस और फ़्रेमिंग में तकनीकी सटीकता
  • भावों पर असर या मिज़ाज में बेहतरी
  • फ़िल्म की कहानी में आसानी से फ़िट बैठने वाला शॉट।
कैप्शन: (बाएँ) ट्रैक पर सेट किया गया पहियों वाला कैमरा रिग, जिससे कैमरे को आगे-पीछे आसानी से चलाया जा सकता है; (दाएँ) व्यक्ति कैमरा स्टेबलाइज़र पकड़े हुए है, जिससे फ़्लोइंग मूवमेंट शॉट्स लिए जा रहे हैं।

ट्रैकिंग शॉट कैसे शूट करें।

किसी भी वीडियो शूट की प्लानिंग के समय तैयारी बहुत ज़रूरी होती है, लेकिन ट्रैकिंग शॉट्स के लिए एक्सट्रा प्लानिंग और प्रैक्टिस की ज़रूरत होती है। सबसे मुश्किल काम होता है कैमरे के मूवमेंट को ऐक्टर्स, लाइटिंग में होने वाले बदलावों, और सीन में मौजूद चलती-फिरती हुई चीज़ों के साथ तालमेल में रखना। अक्सर इन शॉट्स में स्टेडीकैम का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि तालमेल थोड़ा सा भी गड़बड़ होने पर पूरा शॉट खराब कर सकता है।


1. एक शॉट लिस्ट बनाएँ

किसी भी ट्रैकिंग शॉट को कामयाब बनाने के लिए समझना ज़रूरी है कि उस शॉट का इस्तेमाल कब और कहाँ करना है। बिना सोचे-समझे वीडियो में कोई भी ट्रैकिंग शॉट डालने के बजाय, सोचें कि कहानी के नज़रिए से वह कहाँ सबसे असरदार होगा और यह दर्शकों को किरदारों से जुड़ने में कैसे मदद करेगा। आपको अपने मकसद के हिसाब से अपनी प्लानिंग करनी चाहिए, इसलिए एक शॉट लिस्ट बनाएँ और तय करें कि वह शॉट आपके वीडियो में कहाँ आएगा और प्रॉडक्शन में उसके लिए सही जगह कौनसी होगी।


2. अपने इक्विपमेंट्सन जुटाएँ।

अब आपको तय करना होगा कि आपको क्या-क्या इक्विपमेंट्स चाहिए। भले ही आपको पूरे डॉली और ट्रैक सेटअप की ज़रूरत न हो, लेकिन एक कैमरा स्टेबलाइज़र, जैसे, गिंबल या स्टेडीकैम ज़रूर रख लें। इससे कैमरे का मूवमेंट स्मूथ रहता है और फ़ुटेज हिलती-डुलती हुई नहीं नज़र आती। इससे पोस्ट-प्रॉडक्शन में एडिट करना आसान हो जाता है। अगर यह इक्विपमेंट आपके लिए नया है, तो पहले इसकी प्रैक्टिस ज़रूर करें। ऐसा करने से शूटिंग के दौरान होने वाली गलतियाँ कम होंगी और सेटअप को पहले की तुलना में बेहतर तरीके से सँभालना आसान हो जाएगा।


3. रिसर्च और रिहर्स करें।

शूट वाले दिन बिना लोकेशन देखे सीधे सेट पर न पहुँचें। पहले से जाकर लोकेशन का मुआयना ज़रूर करें। आपको सेट पर फ़िजिकल मार्कर, यानी निशान लगाने होंगे, ताकि तय हो सके कि कलाकार कहाँ चलेंगे और कैमरा ऑपरेटर के लिए रास्ता क्या होगा, ताकि सब कुछ फ़ोकस में रहे। अगर सीन में एक्स्ट्रा कलाकार हैं, तो पक्का करें कि हर किसी को पता हो कि शॉट की शुरुआत और आखिर में उन्हें कहाँ होना चाहिए।

अगर सीन में स्पेशल इफे़क्ट्स, चलती गाड़ियाँ, या किसी तरह की कोरियोग्राफ़ी है, तो रिहर्सल और कम्य निकेशन बेहद ज़रूरी हो जाता है। ध्यान रखें कि भले ही सब कुछ ठीक जा रहा हो, फिर भी आपको कुछ शॉट्स दोबारा ले लेने चाहिए, ताकि पक्का हो सके कि हर किसी ने अपना काम सही से अंजाम दिया है।


अपने ट्रैकिंग शॉट्स को पोस्ट-प्रॉडक्शन में पॉलिश करें।

फ़ुटेज शूट करने के बाद, Adobe Premiere में उसकी एडिटिंग करें। Premiere सॉफ्टवेयर में वॉर्प स्टेब्लाइज़र टूल मौजूद होता है, जिसकी मदद से हिलती-डुलती हुई फ़ुटेज को स्टेबल बनाया जा सकता है। इससे फ़िल्ममेकर शूटिंग के दौरान ज़्यादा क्रिएटिव रिस्क ले सकते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि पोस्ट-प्रॉडक्शन में छोटे-मोटे झटके या हल्की-फुल्की गलतियाँ आसानी से ठीक की जा सकती हैं।

स्टेब्लाइज़ेशन से जुड़ी अलग-अलग तकनीकें।

इन-कैमरा स्टेब्लाइज़ेशन:

  • स्मूथ हैंडहेल्ड मूवमेंट के लिए गिम्बल या स्टेडीकैम का इस्तेमाल करें
  • मोशन बिना हिले-डुले एक सीधी लाइन में हो, इसके लिए ट्रैक्स पर इस्तेमाल होने वाली डॉली इस्तेमाल करें
  • छोटे और बारीक मूवमेंट्स के लिए कैमरा स्लाइडर का इस्तेमाल करें।

Premiere में पोस्ट-प्रॉडक्शन स्टेब्लाइज़ेशन।

वॉर्प स्टेब्लाइज़र इफे़क्ट अप्लाई करें:

  • अपनी क्लिप चुनें और इफ़ेक्ट्स > डिस्टॉर्ट > वार्प स्टेब्लाइज़र पर जाएँ।
  • स्मूथनेस और मेथड (पोज़िशन, पोज़िशन/स्केल/रोटेशन) जैसी सेटिंग्स को अडजस्ट करें।
  • CMOS सेंसर आर्टिफै़क्ट्स के लिए रोलिंग शटर रिपेयर इफे़क्ट का इस्तेमाल करें।
  • पोज़िशन और रोटेशन को मैन्युअल तौर पर कीफ़्रेम करें, ताकि आपको सटीक नतीजे मिलें।

ऑप्टिकल फ़्लो इंटरपोलेशन।

अपने ट्रैकिंग शॉट्स को ज़्यादा स्मूथ स्लो-मोशन में बदलने के लिए Premiere के ऑप्टिकल फ़्लो फ़ीचर का इस्तेमाल करें।

नेस्टेड सीक्वेंस स्टेब्लाइज़ेशन।

जटिल शॉट्स के लिए, अपने सीक्वेंस को नेस्ट करें, फिर नेस्ट किए गए सीक्वेंस पर स्टेब्लाइज़ेशन अप्लाई करें।

अपनी फ़ुटेज ऑर्गनाइज़ करें।

आसानी से समझ में आने वाला साफ़-सुथरा फ़ोल्डर स्ट्रक्चर बनाएँ:

  • हर प्रॉजेक्ट के लिए एक अलग मेन फ़ोल्डर बनाएँ।
  • शूटिंग के अलग-अलग दिनों या लोकेशन के हिसाब से सबफ़ोल्डर्स जोड़ें।
  • रॉ फ़ुटेज, ऑडियो और एसेट्स के लिए अलग-अलग फ़ोल्डर्स का इस्तेमाल करें।

फ़ाइल्स के नाम एक ही फ़ॉर्मैट में रखें:

  • फ़ाइल्स के नामों में तारीख, सीन नंबर, और टेक नंबर शामिल करें।
  • उदाहरण: "20240816_Scene05_Take03_TrackingShot.mp4"

Premiere में ऑर्गनाइज़ करने के लिए दिए गए टूल्स इस्तेमाल करें:

  • अलग-अलग तरह के शॉट्स (वाइड शॉट्स, ट्रैकिंग, क्लोज़-अप्स) के लिए अलग-अलग बिन्स बनाएँ।
  • ट्रैकिंग शॉट्स को तुरंत पहचानने के लिए लेबल्स और कलर कोडिंग का इस्तेमाल करें।
  • आसानी से खोजने और फ़िल्टर करने के लिए मेटाडेटा टैग्स जोड़ें।

स्मूथ एडिटिंग के लिए प्रॉक्सी फ़ाइलें बनाएँ:

  • जटिल ट्रैकिंग शॉट्स के लिए कम रेज़लूशन वाली प्रॉक्सी फ़ाइलें जेनरेट करें।
  • पोस्ट-प्रॉडक्शन में तेज़ एडिटिंग के लिए, इन्हें अपने हाई-रेज़लूशन वाली फ़ुटेज से लिंक करें।

सीक्वेंस मार्कर्स का इस्तेमाल करें:

  • ट्रैकिंग शॉट्स में अहम पलों को नोट करने के लिए अपनी टाइमलाइन में मार्कर्स जोड़ें।
  • अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग कलर्स वाले मार्कर्स इस्तेमाल करें (जैसे, स्टेब्लाइज़ेशन की ज़रूरत है, VFX का काम करना है)।

रेग्युलर बैकअप्स:

  • अपनी फ़ुटेज और प्रॉजेक्ट फ़ाइलों की सेक्योरिटी के लिए एक मज़बूत बैकअप सिस्टम का इस्तेमाल करें।
  • एक्सट्रा सेक्योरिटी के लिए और टीम के साथ मिलजुलकर काम करने के लिए क्लाउड स्टोरेज का इस्तेमाल करें।

अलग-अलग तरह के ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल करके देखें।

360-डिग्री वीडियो के बढ़ते इस्तेमाल ने कैमरा ट्रैकिंग शॉट तकनीकों पर काफ़ी असर डाला है। अब फ़िल्ममेकर ऐसे इमर्सिव वीडियो बना सकते हैं, जहाँ दर्शक खुद तय कर सकते हैं कि वे सीन को किस नज़रिए से देखना चाहते हैं। 360-डिग्री ट्रैकिंग शॉट्स की मदद से कहानी कहने का तरीका और भी नया और क्रिएटिव हो गया है। इसमें कैमरा चलते हुए सीन को कवर करता है और दर्शक उस सीन को अलग-अलग दिशाओं से देख सकते हैं।

फ़िल्म प्रॉजेक्ट्स में ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल करने के कई तरीके होते हैं। क्रेन शॉट से लेकर क्लोज़-अप और पॉइंट-ऑफ-व्यू (POV) शॉट तक, सभी ट्रैकिंग शॉट्स निर्देशक के लिए अपनी कहानी को एक नए अंदाज़ में पर्दे पर उतारने में मदद करते हैं।

जहाँ जो राइट की फ़िल्म 'प्राइड एंड प्रीजूडिस' का शुरुआती सीन दर्शकों को धीमी और सुकूनभरी रफ़्तार से बेनेट परिवार के शांत, लेकिन कभी-कभी चहल-पहल से भरे ऐसे घर का एहसास कराता है जो एक गाँव में है। वहीं दूसरी ओर, निर्देशक अल्फ़ोंसो क्युरोन अपनी फिल्म चिल्ड्रेन ऑफ़ मेन में कई लॉन्ग-टेक ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल करते हैं, जो दर्शकों को उथल-पुथल भरे मारकाट वाले माहौल का एहसास कराते हैं।

कॉन्टीजेवस कहते हैं, “लोग अब ट्रैकिंग शॉट्स के साथ अलग-अलग तरह के एक्सपेरिमेंट्स कर रहे हैं, ताकि वे देख सकें कि कैमरा कितनी तेज़ी से चल सकता है और हम कितनी तेज़ी से किसी सीन को ट्रैक कर सकते हैं।” ऐक्शन सीन्स हों या बिना शोर-शराबे वाले जज़्बाती पल, ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल फ़िल्म की रफ़्तार तय करने के लिए किया जा सकता है।

ट्रांज़िशन्स को ऐसा रखें कि पता न चले।

सीन के बीच स्मूथ ट्रांज़िशन जोड़ने और किरदार के सफ़र को फ़ॉलो करने के लिए, ट्रैकिंग शॉट्स एक नया तरीका मुहैया कराते हैं। मार्टिन स्कॉर्सेसी की फ़िल्म गुडफ़ेलास में दर्शक भी उस सफ़र का हिस्सा बन जाते हैं, जब मशहूर गैंगस्टर हेनरी हिल अपनी होने वाली बीवी कैरेन को माफ़िया अंडरवर्ल्ड की आलीशान ज़िंदगी से रू-ब-रू कराता है। कैमरा क्लब के बाहर वाले शुरुआती शॉट से चलता हुआ भीड़भाड़ वाले किचन से होकर रेस्टोरेंट के अंदर पहुँचता है, जिससे दर्शक कहानी के किरदारों के साथ उस शानदार और रोमांचक माहौल को पूरी तरह से महसूस कर पाते हैं।

जज़्बात का मज़बूती से एहसास दिलाने वाली कहानी दिखाएँ।

ट्रैकिंग शॉट्स आपको अलग-अलग पर्सपेक्टिव्स आज़माने का मौका देते हैं और आपकी कहानी को मुख्य किरदार के नज़रिए से पर्दे पर उतारने में मदद करते हैं।

फ़िल्म सेल्मा के क्लाइमैक्स सीन में, एवा डूवर्नी ने बहुत सधे हुए ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल किया है, जहाँ कैमरा मार्टिन लूथर किंग जूनियर और मार्च करने वाले अन्य लोगों को एडमंड पेट्टस ब्रिज पार करते हुए डॉली आउट में फ़ॉलो करता है। इससे दर्शक को मार्च करने वालों के चेहरों पर चिंता और डर साफ़ दिखाई देता है, जब वे पुल के दूसरी तरफ़ छिपे संभावित खतरे की ओर बढ़ते हैं। ये भावनात्मक और असरदार शॉट्स दर्शकों और किरदारों के बीच एक नया और गहरा जुड़ाव बनाते हैं।

जटिल भाव दर्शाएँ।

किसी एक किरदार के मन के भाव या पूरे सीन का मिज़ाज दर्शाना भी ट्रैकिंग शॉट्स के इस्तेमाल का एक शानदार तरीका है।

एमरल्ड फ़ेनेल की फ़िल्म 'प्रॉमिसिंग यंग वुमन' में, मुख्य किरदार का गुस्सा और झुँझलाहट कैमरे के मूवमेंट की वजह से दर्शकों को ज़्यादा महसूस होते हैं। उस सीन में कैमरा उसे एक ट्रक के चारों ओर घूमते हुए फ़ॉलो करता है, जब वह हेडलाइट्स और विंडशील्ड तोड़ रही होती है। इससे दर्शक खुद को उस सीन का हिस्सा महसूस करते हैं, न कि महज़ एक दर्शक। ट्रैकिंग शॉट्स को मूवमेंट से तय किया जाता है, लेकिन जिस सीन और सब्जेक्ट को दिखाया जा रहा है, उसे कैसे फ़िल्माया गया है, यही उस सीन से दर्शकों का कनेक्शन तय करता है।

इन 7 शानदार ट्रैकिंग शॉट्स को देखें।

ऊपर दिए गए मशहूर ट्रैकिंग शॉट्स ज़रूर देखें और जानें कि अलग-अलग निर्देशकों ने एक ही तकनीक का इस्तेमाल करके कितने अलग और अनोखे नतीजे हासिल किए हैं।


1. द शाइनिंग (1980), स्टैनली कुब्रिक की डायरेक्शन

इस मशहूर फ़िल्म में बेचैनी और सस्पेंस बढ़ाने के लिए कई बार ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल किया गया है।


2. 1917 (2019), सैम मेंडेस की डायरेक्शन

यह फ़िल्म इस तरह से शूट और एडिट की गई है कि यह एक लंबे ट्रैकिंग शॉट की तरह दिखती है। फ़िल्म का सबसे छोटा शॉट 39 सेकंड्स का है, जबकि सबसे लंबा और लगातार चलने वाला ट्रैकिंग शॉट साढ़े आठ मिनट्स का है।


3. प्राइड एंड प्रीजूडिस (2005), जो राइट की डायरेक्शन

इस फ़िल्म में भी कई सराहनीय ट्रैकिंग शॉट्स हैं। व्यस्तता, चहल-पहल भरे बॉलरूम से लेकर गाँव की एक शांत सुबह को दिखाने वाले सीन तक, हर शॉट कहानी में असरदार ढंग से अपना किरदार अदा करता है।


4. चिल्ड्रन ऑफ़ मेन (2006), अल्फ़ोंसो क्युआरोन की डायरेक्शन।

इस फ़िल्म में तीन खास ट्रैकिंग शॉट्स हैं। इनमें से सबसे छोटा शॉट लगभग एक मिनट से थोड़ा ज़्यादा लंबा है और सबसे लंबा शॉट लगभग छह-साढ़े छह मिनट तक चलता है। इन सभी शॉट्स में बहुत सारे ऐक्शन्स और चलती हुई गाड़ियाँ दिखते हैं।


5. गुडफ़ेलास (1990), मार्टिन स्कॉरसेसे की डायरेक्शन।

इस फ़िल्म के ट्रैकिंग शॉट्स दर्शकों को ऐसा महसूस कराते हैं जैसे वे खुद भी किरदार की तरह ही आधुनिक दौर के माफ़ियाओं की ऐशो-आराम वाली ज़िंदगी का हिस्सा हैं।


6. सेल्मा (2014), एवा डुवर्ने की डायरेक्शन।

ध्यान रखने वाली बात यह है कि इस फ़िल्म में इस्तेमाल किए गए ट्रैकिंग शॉट्स अक्सर सिर्फ़ कुछ ही सेकंड्स लंबे होते हैं। वहीं, कैरेक्टर का पीछा करते हुए कैमरे से उसके मूवमेंट्स दिखाना दर्शकों को एक अलग और खास तरह से कहानी व ऐक्शन से जोड़ता है।


7. प्रॉमिसिंग यंग वुमन (2020), एमरल्ड फे़नेल की डायरेक्शन।

ध्यान रखें कि इस फ़िल्म में इस्तेमाल किए गए ट्रैकिंग शॉट्स सिर्फ़ कुछ ही सेकंड्स लंबे हैं। लेकिन चलता हुआ कैमरा मूवमेंट, जो स्क्रीन पर दिख रहे किरदारों का पीछा करता है, दर्शकों को ऐक्शन से एक अनोखे अंदाज़ में रू-ब-रू कराता है।


ट्रैकिंग शॉट्स का इस्तेमाल करके अपने वीडियो की रफ़्तार में बदलाव किया जा सकता है, जो आपके दर्शकों को एक नया नज़रिया भी देता है। चाहे आपको उन्हें किसी नई दुनिया में ले जाना हो या कोई अलग नज़रिया दिखाना हो, कैमरा ट्रैकिंग शॉट्स आपकी इसमें मदद कर सकते हैं। इसलिए, ट्रैकिंग शॉट्स आज़माएँ और Premiere की मदद से अपने वीडियोज़ में जान डालें।

क्या आपको कुछ पूछना है? हमारे पास आपके सवालों के जवाब मौजूद हैं।

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