वीडियो
फ़िल्म में लो ऐंगल शॉट क्या होता है?
फ़िल्म में लो-ऐंगल शॉट्स के बारे में जानें और समझें कि ये किसी किरदार को ताकतवर या लाचार कैसे दिखाते हैं। साथ ही उन मशहूर फ़िल्मों के बारें में जानें जिनमें लो-ऐंगल शॉट्स ने सीन्स को यादगार बना दिया है।
सीधे मनचाहे सेक्शन पर जाएँ
लो-ऐंगल शॉट्स को समझना।
वर्ल्ड रेसलिंग फ़ेडरेशन की कैमरा टीम अक्सर आंद्रे द जायंट को लो-ऐंगल से शूट करती थी, जिससे वे स्क्रीन पर और भी लंबे दिखें। रेसलिंग के इस महान खिलाड़ी की लंबाई 7 फ़ीट 4 इंच है, पर कैमरा टीम उन्हें और भी बड़ा दिखाती थी, ताकि WWF और आंद्रे के लाखों फ़ैन्स को 'पैसा वसूल' रोमांच मिले।
लो-ऐंगल शॉट्स सब्जेक्ट को बड़ा, चौड़ा, लंबा और करीब से दिखाते हैं। कैमरे की इसी जादुई ट्रिक का इस्तेमाल फ़िल्ममेकर बार-बार करते हैं ताकि राक्षसों को और भयावह, नायकों (या खलनायकों) को ज़्यादा शक्तिशाली व पीड़ितों को और भी ज़्यादा असुरक्षित दिखाया जा सके।
लो-ऐंगल शॉट क्या होता है?
लो-ऐंगल शॉट एक ऐसा फ़िल्मी शॉट है जिसमें कैमरे को आई लाइन से नीचे रखकर ऊपर की ओर फ़ोकस किया जाता है। लो-ऐंगल व्यूज़ का इस्तेमाल वाइड शॉट्स, मीडियम शॉट्स, क्लोज़-अप्स और सिनेमा जैसे स्टैंडर्ड शॉट्स के साथ किया जा सकता है।
ये शॉट्स लगभग 45 डिग्री पर लिए जाते हैं, लेकिन ज़रूरत के हिसाब से इनका ऐंगल बदला जा सकता है। ये सब्जेक्ट की आई लाइन से कुछ इंच नीचे से लेकर ज़मीन तक कहीं भी हो सकते हैं। घुटने के नीचे से लिया गया लो-ऐंगल शॉट, एक्सट्रीम लो-ऐंगल शॉट कहलाता है।
डायरेक्टर्स फ़िल्म एडिटिंग के साथ-साथ कैमरा ऐंगल्स का इस्तेमाल करते हैं, ताकि दर्शकों की सोच पर हल्का सा (या साफ़ तौर पर) साइकॉलॉजिकल असर डाला जा सके। लो-ऐंगल शॉट्स की मदद से डायरेक्टर्स अपने मनचाहे तरीके से किरदारों को दिखाते हैं, जैसे कि कभी कमज़ोर या ताकतवर, तो कभी हावी या असुरक्षित।
लो-ऐंगल शॉट्स किरदार की ताकत उजागर करते हैं।
अक्सर फ़िल्ममेकर्स लो-ऐंगल शॉट्स का इस्तेमाल करते हैं ताकि ताकतवर किरदार, चाहे वो हीरो हो, विलेन या फिर राक्षस उसे और भी ज़्यादा लंबा, बड़ा, शक्तिशाली और डरावना दिखाया जा सके।
रात के सन्नाटे में गूँजती अनजानी आहटें।
लो-ऐंगल शॉट्स की ताकत को समझने के लिए, हम एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर चढ़ते किंग कॉन्ग (1933) या टोक्यो की सड़कों पर कहर बरपाते गॉडज़िला (1954) जैसे सीन्स का उदाहरण ले सकते हैं। इन साइंस फ़िक्शन क्लासिक्स ने स्टीवन स्पीलबर्ग जैसे डायरेक्टर्स पर गहरा असर डाला है, जिन्होंने बताया कि गॉडज़िला उनकी फ़िल्मों जुरासिक पार्क और जॉज़ की सिनेमैटोग्राफ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल रही (इस फ़िल्म का प्रभाव मार्टिन स्कॉर्सेसी और टिम बर्टन जैसे डायरेक्टर्स पर भी देखा गया है, जिन्होंने इसे अपने लिए प्रेरणास्रोत बताया है)।
या हम फ़िल्म इतिहास में और पीछे जाएँ, तो बात नोस्फ़ेरातू (1922) तक पहुँचती है। इस जर्मन हॉरर फ़िल्म और बाद में द इनविज़िबल मैन (1933) में इस्तेमाल किए गए लो-ऐंगल कैमरा शॉट्स ने ड्रैकुला (1931), फ़्रैंकेंस्टाइन (1931), द वुल्फ़ मैन (1941), क्रीचर फ़्रॉम द ब्लैक लैगून (1954), द ममी (1959) और उनके जैसी अनेक हॉरर फ़िल्मों के विज़ुअल टेम्पलेट को आकार देने में अहम भूमिका निभाई।
यही पैटर्न आगे चलकर मॉर्डन हॉरर फ़िल्मों का चेहरा बना, जहाँ इंसानी राक्षस, जैसे साइकोपैथ और सीरियल किलर को अक्सर लो-ऐंगल कैमरा शॉट्स के ज़रिए और भी डरावना दिखाया जाता है। (यही तो कमाल है, यह ट्रिक न सिर्फ़ किरदारों को डरावना दिखाती है, बल्कि दर्शकों को भी भीतर तक असुरक्षित महसूस कराती है, नीचे देखें।)
हीरोज़ और विलेन्स।
अ न्यू होप में डार्थ वेडर द्वारा डेथ स्टार के गलियारों में पहली बार कदम रखने वाले सीन को लो-ऐंगल में फ़िल्माना कोई संयोग नहीं था बल्कि यह जानबूझकर लिया गया शॉट था, ताकि उनकी मौजूदगी दानवी लगे। उनके कपड़ों और आवाज़ के साये से उपजे भय को अंतिम रूप देने के लिए लो-ऐंगल से लिया गया शॉट वेडर को और भी ज़्यादा प्रभावशाली और डरावना बना देता है। दरअसल, यह शॉट उनके किरदार का इतना अहम हिस्सा बन चुका है कि स्टार वॉर्स सीरीज़ की हर फ़िल्म में इसे लगातार बरकरार रखा गया है।
चूँकि लो-ऐंगल शॉट्स का संबंध शक्ति और वर्चस्व दिखाने से है, इसलिए हमें ये शॉट्स अक्सर उन ऐक्शन फ़िल्मों में देखने को मिलते हैं जिनमें लड़ाई या युद्ध के सीन भरे होते हैं, ख़ासकर ग्लेडिएटर, ब्रेवहार्ट, या रैम्बो जैसी फ़िल्मों में, जहाँ ऐसे शॉट्स का इस्तेमाल हीरो को वीर और शक्तिशाली दिखाने के लिए किया जाता है। हम अपने सुपरहीरोज़ को करिश्माई रूप में देखने के आदी हो चुके हैं, चाहे वह सुपरमैन, वंडर वूमन , ब्लैक पैंथर हो, या MCU के सुपरहीरोज़ की टीम।
क्रिस्टोफ़र नोलन ने द डार्क नाइट में विलेन को हीरो जैसा ट्रीटमेंट देकर दर्शकों को ऐसा झटका दिया कि सब दंग रह गए। जोकर को बैटमैन जितना ताकतवर दिखाने के लिए नोलन ने कई बेहद लो-ऐंगल शॉट्स का इस्तेमाल किया। उदाहरण के तौर पर, उस सीन में जब उसका ट्रक पलट जाता है, तो वह बाहर निकलकर गोलियाँ बरसाने लगता है; पागलपन की हद तक बेखौफ़, जैसे कोई उसे छू भी नहीं सकता।
लो-ऐंगल शॉट्स का इस्तेमाल किरदार को असुरक्षित दिखाने के लिए भी किया जा सकता है।
ताकत का दूसरा पहलू असुरक्षा है। लो-ऐंगल शॉट्स न केवल रोमांचक होते हैं बल्कि इनका इस्तेमाल कई तरह से किया जा सकता है। ये हमें पीड़ित की नज़र से चीज़ें देखने पर मजबूर करते हैं, जैसे हम खुद उनकी जगह हों।
"सर, यस सर!"
एक अलग किस्म का जोकर फ़ुल मेटल जैकेट फ़िल्म में कहीं ज़्यादा असुरक्षित दिखाई देता है, क्योंकि मरीन बूट कैंप में ड्रिल इंस्ट्रक्टर की कठोर निगाहों के नीचे, प्राइवेट जोकर की हर हरकत पर नज़र रखी जाती है। ऐक्टर आर. ली एर्मे, जो असल ज़िंदगी में भी मरीन ड्रिल इंस्ट्रक्टर रहे हैं, ने गनरी सार्जेंट हार्टमैन को ऐसी सच्चाई से जिया कि यह किरदार अब फ़िल्म इतिहास का हिस्सा बन चुका है। क्यूब्रिक की टीम ने भी मदद की, भले ही एर्मे को उसकी ज़रूरत नहीं थी। हार्टमैन को ऊपर के बजाय नीचे से दिखाते हुए कैमरा धीरे-धीरे नीचे जाता है जिससे वह और भी ज़्यादा डरावना लगता है और जोकर (मैथ्यू मोडीन) की असहायता स्क्रीन पर जीवंत हो उठती है।
फ़िल्मों में दिखाई गई असुरक्षा कभी-कभी ड्रामेटिक रूप ले लेती है और लो-ऐंगल कैमरा शॉट्स उस ड्रामा को बढ़ाने में मदद करते हैं। अक्सर कैमरे के सामने वह किरदार होता है, जो किसी भयानक खतरे की चपेट में आने वाला है, ठीक वैसे ही जैसे हर हॉरर फ़िल्म में होता आया है। कभी-कभी सबजेक्ट सचमुच एक पीड़ित व्यक्ति हो सकता है, जैसा कि वॉर फ़िल्म में दिखाया जाता है। (लड़ाई और युद्ध के सीन्स में, जहाँ कोई हीरो या सुपरहीरो जीत रहा होता है, वहाँ किसी न किसी को हारना भी पड़ता है।) या फिर वह महज़ एक आम इंसान भी हो सकता है, जो सत्ता के खेल में गलत छोर पर खड़ा है।
भूमिकाएँ बदलना।
बच्चों को हमेशा किसी न किसी रूप में शक्तिहीन या निर्भर समझा जाता है। वे अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में हर चीज़ की ओर ऊपर देखकर ही बड़े होते हैं। इसलिए यह कोई अचरज की बात नहीं कि बच्चों पर बनी फ़िल्मों में हमें ढेर सारे लो-ऐंगल शॉट्स देखने को मिलते हैं। दरअसल, मटिल्डा और मूनराइज़ किंगडम जैसी फ़िल्में इसका शानदार उदाहरण हैं। इनकी सिनेमैटोग्राफ़ी जानबूझकर वयस्क किरदारों को फ़्रेम में प्रभावशाली बनाती है, ताकि बच्चों की नज़र से दुनिया की उस असमानता को गहराई से महसूस किया जा सके।
जॉन ह्यूज़ ने होम अलोन के ज़रिए इन पुरानी धारणाओं को पूरी तरह उलट दिया। इस फ़िल्म में केविन मैककैलिस्टर नाम का एक छोटा-सा लड़का गलती से घर पर रह जाता है, जब उसका परिवार क्रिसमस की छुट्टियों पर पेरिस चला जाता है। अकेला बच्चा दो चालाक (भले ही थोड़े अनाड़ी) चोरों से अपने शिकागो वाले घर की रक्षा करने के लिए मजबूर है। फ़िल्म में कैमरा ऐंगल्स लगातार बदलते रहते हैं, ताकि केविन और चोरों के बीच चल रहे इस बिल्ली-चूहे के खेल में होने वाले उतार-चढ़ाव से तालमेल बना रहे। हालाँकि अंत में केविन की जीत होती है, लेकिन फ़िल्म में कई लो-ऐंगल शॉट्स ऐसे भी हैं, जहाँ हैरी और मार्व उसे घेर लेते हैं और डराने की कोशिश करते हैं (भले ही उनकी कोशिश कुछ हास्यास्पद ही क्यों न लगे)।
कैमरा ऐंगल्स (चाहे हाई हो या लो) किसी किरदार को हमेशा एक ही रूप में बाँधकर नहीं रखते। गेम ऑफ़ थ्रोन्स में कैमरा ऐंगल्स लगातार बदलते हैं, और यह बदलाव इस बात पर निर्भर करता है कि उस वक्त सत्ता के खेल में कौन-सा किरदार ऊपर है और कौन नीचे। वहीं ब्रेकिंग बैड की शुरुआत में लगातार लो-ऐंगल शॉट्स का इस्तेमाल किया गया है, जिनकी मदद से वॉल्टर वाइट को एक कमज़ोर और मौत के कगार पर खड़े व्यक्ति के रूप में दिखाया गया। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कैमरा ऐंगल्स भी उसके साथ बदलते जाते हैं, धीरे-धीरे ऊँचाई से लिए गए शॉट्स वॉल्टर वाइट के उस सफ़र को दर्शाते हैं, जिसमें वह एक असहाय इंसान से ताकतवर, निर्णायक शख़्सियत में बदल जाता है।
लो-ऐंगल शॉट्स सिर्फ़ किरदारों के लिए ही नहीं होते। इनका इस्तेमाल लोकेशन को नाटकीय रूप से दिखाने के लिए भी किया जा सकता है, जैसे कि एस्टैब्लिशिंग शॉट्स के तौर पर या मनचाही टोन रचने के लिए। याद करें साइको की उस ऊँची पहाड़ी पर खड़ी भारी-भरकम बैट्स हवेली को। उसे बार-बार वाइड लो-ऐंगल शॉट्स में दिखाया गया, ताकि वह केवल इमारत नहीं, बल्कि एक जीवित किरदार लगे, जो फ़िल्म का बैकग्राउंड तय करने के साथ ही उसके हर सीन में एक अनजाना डर और बेचैनी भी भर देता है। यह डर पैदा करने वाला माहौल इतना असरदार था कि बाद में बने टीवी सीक्वल बैट्स मोटेल में भी उसे दोहराया गया है।
लो-ऐंगल शॉट्स किस हद तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं?
कुछ डायरेक्टर्स लो ऐंगल और एक्सट्रीम लो ऐंगल से लिए जाने वाले शॉट्स के लिए जाने जाते हैं।
क्वेंटिन टैरेंटीनो का “ट्रंक से दिखाया गया व्यू” जैसे कैमरा ऐंगल पर लगभग पेटेंट-सा हक है चाहे वो (पल्प फ़िक्शन) में हिटमैन विन्सेंट और जूल्स हों जो ट्रंक खोलकर अपने हथियार निकालते हैं, या (रेज़र्वॉयर डॉग्स) में कोई ऐसा शख्स जो सचमुच ट्रंक के अंदर से ऊपर खड़े किरदारों को देख रहा हो।
माइकल बे ने लो-ऐंगल शॉट्स का ऐसा अनोखा रूप गढ़ा कि अब वह उन्हीं के नाम से जाना जाता है। “माइकल बे 360 शॉट”, जिसकी शुरुआत बैड बॉयज़ में हुई, एक लो-ऐंगल से लिया गया सर्कुलर कैमरा मूवमेंट है, जो उस तनावपूर्ण पल को और भी नाटकीय बना देता है, जब किरदारों को अचानक एहसास होता है कि वे अब सचमुच मुसीबत में फँस चुके हैं।
लेकिन यह तय है कि लो-ऐंगल शॉट्स के मामले में ऑर्सन वेल्स हमेशा बादशाह बने रहेंगे। टच ऑफ़ ईवल और द लेडी फ़्रॉम शंघाई दोनों ही इस तकनीक के शानदार उदाहरण हैं, लेकिन एक ऐसी दूसरी फ़िल्म है जिसने अकेले ही उन्हें इस क्राउन का हकदार बना दिया। सिटिज़न केन को अब तक की सबसे महान अमेरिकी फ़िल्म माना जाता है। इसमें मौजूद लो-ऐंगल सीन्स की ज़्यादा संख्या के कारण इसे “सबसे ज़्यादा छतें दिखाने वाली फ़िल्म” भी कहा गया है। पूरी फ़िल्म में ऑर्सन वेल्स ने केन को लो-ऐंगल से फ़िल्माया है, जिससे वह वर्चस्व का प्रतीक बन जाता है। इन सीन्स में दर्शक उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं, जो सत्ता के नशे में चूर है।
फ़िल्म में एक सीन ऐसा भी है जिसमें चुनाव में हार के बाद केन को लीलैंड के साथ दिखाया गया है और इसे शुरू से अंत तक लो-ऐंगल से फ़िल्माया गया है। इसके बावजूद, लो-ऐंगल शॉट्स की सारी सीमाएँ पार करने के बाद भी वेल्स को संतुष्टि नहीं मिली। ऑर्सन वेल्स इतने परफ़ेक्शनिस्ट थे कि उन्होंने स्टूडियो के फ़र्श में सचमुच एक छेद करवाया, ताकि कैमरे को और नीचे ले जाया जा सके, जब तक कि उन्हें अपना मनचाहा ऐंगल नहीं मिल गया।
वीडियो और फ़िल्म प्रॉजेक्ट्स को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँ।
अलग-अलग कैमरा ऐंगल्स और फ़िल्म बनाने के क्रिएटिव तरीकों का इस्तेमाल करके ऐसा कॉन्टेंट तैयार करें जो दर्शकों को बाँध ले और इन खास टिप्स और ट्रिक्स की मदद से फ़िल्म एडिटिंग में महारत हासिल करें।
जानें कि Adobe {{premiere}} की मदद से क्या-क्या किया जा सकता है।