1. लाइटिंग पर समय और पैसा खर्च करें।
अच्छी फ़ुटेज पाने के लिए, लाइटिंग को सोच-समझकर रखना बहुत ज़रूरी होता है। खासतौर से, जब कैमरे में किरदार और बैकग्राउंड, दोनों दिख रहे हों। रोज़ कहती हैं, "पक्का करें कि आपके सेट पर अच्छी नैचुरल लाइट हो या अन्य लाइट्स व लाइट मॉडिफ़ायर की मदद से लाइट को इस तरह कंट्रोल करें कि किरदार के चेहरो को एक खास बनावट और गहराई मिले। थ्री-पॉइंट लाइटिंग को आज़माया जा सकता है, ताकि आपके पास एक मुख्य लाइट, एक हेयर लाइट, और एक बैकग्राउंड लाइट हो।"
आप हाई-की या लो-की लाइटिंग में से जो भी चुनें, यह आपके सीन के मूड से तय होगा। हाई-की लाइटिंग से तेज़ रोशनी वाले ऐसे सीन बनाए जा सकते हैं जिनमें कॉन्ट्रास्ट कम होता है। यह हँसी-खुशी वाले सीन्स या विज्ञापनों के लिए परफ़ेक्ट होती है। वहीं, लो-की लाइटिंग सिनेमैटिक ड्रामा और सस्पेंस वाले सीन्स के लिए बढ़िया होती है।
2. अपने किरदारों को ठीक से जाँचें।
कैमरे से दूर हटकर एक मिनट के लिए ज़रूर देखें कि आपके किरदार दिखने में कैसे लग रहे हैं। रोज़ कहती हैं, "जब आपके पास कोई स्टाइलिस्ट न हो और आपको अकेले सारा काम सँभालना हो, तो आपको ही पक्का करना होगा कि किरदार के कान की बालियाँ सही दिख रही हों, बाल उलझे न हों, या कॉलर सही जगह पर हो।"
साथ ही, यह भी देखें कि वॉर्डरोब, प्रॉप्स, और बाल अलग-अलग समय पर लिए गए शॉट्स में एक-दूसरे से मैच करते हों। इनका मैच न होना, वे गड़बड़ियाँ हैं जो दर्शकों का ध्यान कहानी से हटा सकती हैं, क्योंकि एक से दूसरे सीन के बीच चीज़ें बदल जाती हैं और सीन्स के बीच का तालमेल टूट जाता है। बोल्डेन कहती हैं, "अगर किसी सीन में आपके एक हाथ में सोडा वॉटर का कैन है और अगले सीन में वह दूसरे हाथ में है, तो दर्शकों को यह बदलाव खटकता है।" अगर यह कोई जानबूझकर लिया गया जम्प कट नहीं है, तो यह आपके काम और कहानी से दर्शकों का भरोसा तोड़ देता है।
3. आस-पास के माहौल पर ध्यान दें।
अपने बैकग्राउंड के बारे में सोच-समझकर फ़ैसला लें। रोज़ कहती हैं, "देखें कि बैकग्राउंड दिलचस्प हो और जब कैमरा बैकग्राउंड को धुँधला करे, तो वह सुंदर लगे और शॉट में टेक्सचर जोड़ दे।" लेकिन बैकग्राउंड में बहुत सारी चीज़ें नहीं होनी चाहिए। अगर वहाँ बहुत कुछ हो रहा होगा, तो दर्शक कहानी पर ध्यान नहीं दे पाएँगे। (अगर बैकग्राउंड में एक्स्ट्रा कलाकार हैं, तो ध्यान रखें, क्योंकि वे कैमरे में आने की कोशिश कर सकते हैं।)
4. कम्पोज़िशन के बारे में सोच-समझकर फ़ैसला लें।
आपको बेहतरीन शॉट तभी मिलते हैं जब फ़्रेम को सोच-समझकर सेट किया जाए, इसलिए पहले से तैयारी करें। प्रॉडक्शन शुरू करने से पहले एक स्टोरीबोर्ड बनाएँ, फिर एक शॉट लिस्ट तैयार करें। देखें कि मीडियम क्लोज़-अप से आपको क्या हासिल करना है और कैमरे की हलचल या बैकग्राउंड डिज़ाइन, दर्शकों का ध्यान खींचने में कैसे मदद करेंगे।
और हाँ, फ़्रेम दिखने में कितना सुंदर है, इस पर भी ध्यान दें। रोज़ कहती हैं, "किरदार के पीछे का कम्पोज़िशन, चाहे वह धुँधला ही क्यों न हो, उसे ऐसा होना चाहिए कि आपका फ़्रेम सुंदर दिखे।"
5. कई तरह से काम आने वाले लेंस का इस्तेमाल करें।
मीडियम क्लोज़-अप के लिए पोर्ट्रेट लेंसेज़, जैसे, 24mm–70mm लेंस बेहतरीन काम करते हैं। बोल्डेन कहती हैं, "इससे नज़दीक के शॉट भी लिए जा सकते हैं, लेकिन मीडियम दूरी से यह ज़्यादा अच्छा नतीजा देता है। शॉट एकदम साफ़-सुथरा आता है।"
ज़ूम लेंस का इस्तेमाल करके आप किरदार से थोड़ी दूरी बनाकर रख सकते हैं, ताकि वह कैमरे के सामने घबराए नहीं। बोल्डन बताती हैं, "जब मुझे यह शॉट लेना होता है, तो मैं किरदार से पाँच या छह फ़ीट पीछे खड़ी होती हूँ, फिर लेंस से नज़दीकी एडजस्ट करती हूँ। उनका कहना है, "मैं व्यक्ति को थोड़ा स्पेस देती हूँ ताकि वह बहुत ज़्यादा नज़दीकी महसूस न करे।"